लाइक का गणित और व्यक्तित्व का आईना



आज के दौर में “लाइक” केवल एक क्लिक नहीं रह गया है। तकनीकी रूप से यह एक सेकंड का काम है, लेकिन सामाजिक अर्थों में यह इतना “महंगा” हो चुका है कि लोग इसे सोच-समझकर ही देते हैं। सोशल मीडिया पर जब कोई व्यक्ति पूरे मन और मेहनत से किया कोई रचनात्मक काम करता है, या अपनी रचना कोई पेश करता है कभी समाजहित में, कभी किसी व्यवस्था सुधार के लिए या कभी केवल अपनी उपलब्धि साझा करने के लिए, तो स्वाभाविक रूप से उसे उम्मीद रहती है कि उसके लोग उसकी मेहनत की कद्र करेंगे। लेकिन वास्तविकता उलटी होती है। लाइक ज़्यादातर उन्हीं से आते हैं जो आपसे प्रत्यक्ष रूप से जुड़े नहीं होते। आपके अपने परिवार, समाज या संगठन  के लोग अक्सर चुपचाप देख कर आगे बढ़ जाते हैं।


कारण यह है कि “लाइक” अब साधारण प्रतिक्रिया नहीं रहा। इसे स्थायी समर्थन मान लिया गया है। लोग सोचते हैं कि यदि उन्होंने किसी पोस्ट को लाइक किया तो मानो वे उस व्यक्ति के “हमेशा के अनुयायी” बन गए। इसी भ्रम ने लाइक को बोझिल बना दिया है। जबकि सच्चाई यह है कि लाइक केवल उस काम की मेहनत की सराहना होना चाहिए, जिसे लेखक खुशी से साझा करता है। लेकिन यहां एक और विडंबना है—10 प्रतिशत सचमुच व्यस्त लोगों को छोड़कर बाक़ी सब लोग अक्सर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि उन्हें पढ़ने का समय ही नहीं मिला। हकीकत यह है कि वे पढ़ लेते हैं, लेकिन प्रतिक्रिया देने से बचते हैं। इस बीच रचनाकार अपना काम पूरा करके, खुद को स्थापित कर चुका होता है और सफलता पा लेता है।

Rtn Anand Acharya यह स्थिति समाज में एक अजीब दौड़ पैदा कर चुकी है। जैसे चूहा-बिल्ली का खेल हो, वैसा ही सोशल मीडिया का माहौल बन गया है। अगर आप अपने छोटे-से दायरे से बाहर किसी और की पोस्ट को लाइक कर दें, तो अपने ही दो-चार दोस्त सवाल करने लगेंगे। कभी-कभी तो जीवनभर की दोस्ती भी इस चक्कर में खटाई में पड़ जाती है। लोग अपने विवेक और समाज से जुड़ाव की भावना को छोड़कर केवल तीन-चार लोगों की नज़र में बने रहने के लिए पूरे परिवार, पूरे क्लब और पूरे समाज से कट जाते हैं।

यही वह मोड़ है जहां किसी व्यक्ति का असली व्यक्तित्व सामने आता है। यह साफ़ हो जाता है कि आप केवल किसी गुट से बंधे व्यक्ति हैं या एक स्वाभाविक इंसान—यहां तक कि एक स्वाभाविक नेता भी। यदि आप इस बंधन को नहीं तोड़ पाते, तो आप उन 90% लोगों में शामिल रह जाते हैं, जो हर जगह औसत स्तर पर अटक जाते हैं।

दुनिया का हर क्षेत्र इसी 90 और 10 प्रतिशत के नियम पर चलता है। किसी भी कक्षा में केवल 10% विद्यार्थी ही सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं, बाक़ी औसत रह जाते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी केवल 10% पास होकर नौकरी पाते हैं, शेष बार-बार प्रयास करते हैं। व्यवसाय में भी 10% लोग शीर्ष पर पहुँचते हैं, जबकि 90% लोग छोटे स्तर पर जीवन काटते रहते हैं। क्लबों और समाजों में भी यही स्थिति है—अधिकांश लोग केवल नाममात्र के सदस्य रहते हैं, और उनमें से कुछ ही सक्रिय होकर नेतृत्व करते हैं। यही अनुपात व्यक्ति को विशिष्ट और सामान्य में बांटता है।

गुटबाज़ी इसका दूसरा रूप है। दो गुटों के बड़े नेता सार्वजनिक मंचों पर आपसी सद्भाव दिखाते हैं, लेकिन उनके समर्थक लोग आपस में भिड़ते रहते हैं। 90% लोग इस झगड़े में उलझकर अपनी ऊर्जा गँवा देते हैं, जबकि 10% लोग असल काम निकालते हैं और अपने व्यक्तित्व को और मज़बूत करते हैं। इसीलिए कहा जा सकता है कि गुट में फंसना व्यक्ति को सीमित कर देता है और उसकी पहचान खो देता है।

असल सवाल यह है कि क्या आप दूसरों का मनोबल बढ़ाने के लिए प्रतिक्रिया देते हैं, या केवल खुद को श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते हैं। यदि आप सीमित दायरे में रहकर निष्क्रिय हो जाते हैं, तो आप संगठन में भी “पैसिव” बने रहते हैं, और यह आपके व्यक्तित्व के विकास में बाधा डालता है।

यदि आपको एक स्वाभाविक इंसान या सच्चा लीडर बनना है, तो आपके विचार और प्रतिक्रियाएं मौलिक और ईमानदार होनी चाहिए। दुनिया को हर तरह के व्यक्तित्वों की ज़रूरत है। लेकिन सच्चे, निष्कपट और स्वाभाविक लोग ही दिल से स्वीकार किए जाते हैं।